कामाख्या मंदिर का इतिहास और कथाये kamakhya temple stories & history in hindi

कामाख्या मंदिर का स्थान सती माता के 51 शक्तिपिठो में सर्वोच्च है. यह स्थान असम में स्थित गुवाहाटी से आठ किलोमीटर की दुरी पर स्थित है. यह मंदिर सर्वोच्च शक्ति पीठ है और इसे सृष्टि की जननी का द्वार माना जाता है. इस मंदिर मे कामाख्या देवी की कोई मूर्ति नहीं है बल्कि यहाँ उनके पत्थर रूप की पूजा होती है. कामाख्या देवी मंदिर से संबंधित कई कथाये है जिनका वर्णन हमें पौराणिक ग्रंथो से प्राप्त होता है.

                                                                          

कामाख्या मंदिर का इतिहास

 

कामाख्या देवी मंदिर का तांत्रिक महत्व है, यह स्थान शक्ति साधना का बहुत बड़ा केंद्र है. इस मंदिर में तांत्रिक सिद्धिया प्राप्त की जाती है. प्राचीन काल से ही यह स्थान तंत्र सिद्धि का केंद्र और सर्वोच्च स्थान रहा है. यह कहा जाता है की इस मंदिर का पुनर्निर्माण राजा नर नारायण द्वारा 17वी शताब्दी में कराया गया क्योकि 16वी सदी में इस मंदिर को नष्ट कर दिया गया था.  इस मंदिर में प्रतिवर्ष ‘अंबुवासी मेले’ का आयोजन किया जाता है. इस मेले में कई साधू और तांत्रिक भाग लेते है. कामाख्या देवी मंदिर मे सती माता का योनी भाग होने की वजह से माता राजस्वला होती है. हर साल आयोजित होने वाले अंबुवासी मेले के दौरान पास मे स्थित ब्रहमपुत्र नदी का पानी तीन दिन के लिये लाल हो जाता है ऐसी मान्यता है की ये लाल रंग कामाख्या देवी के मासिक धर्म के कारण होता है.

 

कामाख्या मंदिर से संबंधित कथाये

 

कामाख्या मंदिर

 

इस मंदिर से संबंधित कथाओ का विवरण हमें पौराणिक ग्रंथो में मिलता है. एक कथा के अनुसार जब दक्ष प्रजापति अपनी बेटी सती के पती शिव का अपमान कर देते है तो सती अपने पिता द्वारा कराये जा रहे यज्ञ के अग्निकुंड मे कूदकर आत्मदाह कर लेती है. इससे भगवान शिव क्रोधित हो जाते है और उनके शव को लेकर तांडव करने लगते है. तब भगवान् शिव का अपनी पत्नी सती के प्रति मोहभंग करने के लिये भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के 51 टुकड़े कर देते है. जहाँ जहाँ पर ये टुकड़े गिरे उन्हें आज शक्तिपीठ कहा जाता है. इन टुकड़ो में से माता सती की योनी और गर्भ इसी स्थान पर आकर गिरते है जिसे आज कामाख्या मंदिर कहा जाता है. नीलांचल पर्वत मालाओ के बीचो बीच यह स्थान स्थित है. माँ कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ सभी शक्तिपिठो में सर्वोच्च स्थान रखता है.

 

  • कामाख्या देवी मंदिर से संबंधित एक अन्य कथा के अनुसार ये कहा जाता है की जब कामदेव अपना पुरुषत्व खो बैठे थे तो इसी स्थान पर पड़े सती माता के योनी और गर्भ की मदद से अपना पुरुषत्व वापिस पाया था.

 

  • इस मंदिर से संबंधित एक अन्य कथा भी चर्चित है जिसके अनुसार इसी स्थान पर शिव भगवान और पार्वती माता के बीच प्रेम का प्रारंभ हुआ जिसे संस्कृत में काम कहा जाता है. इसी कारण इस मंदिर का नाम कामाख्या पड़ा.

 

 

नरकासुर का दुराग्रह

एक अन्य कथा ये कहती है की असुर नरकासुर कामाख्या देवी को अपनी पत्नी बनाना चाहता था. लेकिन कामाख्या देवी ने असुर नरकासुर की मौत को निकट मानकर उसके सामने एक शर्त रखी की वे तभी उससे विवाह करेगी जब वो नीलांचल पर्वत पर चारों तरफ पत्थरों के चार सोपान पथों का निर्माण कर दे और मंदिर के साथ एक विश्राम-गृह बनवा दे, लेकिन अगर वो ऐसा न कर पाये तो उसकी मौत निश्चित है. असुर नरकासुर ने ये बात मान ली और पथो के चारो सोपान सुबह होने से पहले ही पुरे कर लिये और विश्राम कक्ष बनाने लगा तब देवी कामाख्या को लगा की वो इस कार्य का निर्माण पूरा कर लेगा तब उन्होंने एक युक्ति द्वारा कौए को मुर्गा बना दिया और उसे भोर होने से पहले ही रात्री समाप्ति की सुचना देने को कहा. मुर्गे ने ऐसा ही किया तो असुर नरकासुर को लगा की वह अपना कार्य पूरा नहीं कर पाया है लेकिन जब उसे असलियत का पता चला तो वह क्रोधित हो गया और मुर्गे का पीछा कर उसे मार डाला.जिस स्थान पर उस मुर्गे को मारा गया वह आज कुकुराकता के नाम से विख्यात है. बाद में असुर नरकासुर का वध भगवान विष्णु ने कर दिया.

 

इस बारे में ओर यहाँ से जाने – जानिये कैसे हुआ नरकासुर का वध

 

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