धनतेरस की कहानी क्यों और कैसे मनाया जाता है

धनतेरस आने वाली है तो आज हम अपने पोस्ट मे धन तेरस के बारे में और  इसकी पौराणिक कहानी के बारे में जानेंगे. धनतेरस का त्यौहार दिवाली से दो दिन पहले मनाया जाता है.  ये त्यौहार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाता है. धनतेरस को धन त्रयोदशी भी कहा जाता है. इस दिन धन की देवी लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा की जाती है. इस दिन लोग सोने चांदी या धातु के बर्तन खरीदते है. ऐसा करना शुभ माना जाता है.

 

इस भगवान धनवन्तरी की पूजा भी की जाती है. ऐसा करना शुभ माना जाता है. धनवन्तरी का जन्म समुद्र मंथन से इसी दिन हुआ था, वह अमृत का कलश लेकर निकले थे. भगवान धनवन्तरी को औषधी का जनक भी कहा जाता है क्यों समुद्र मंथन के दौरान वे कलश के साथ आयुर्वेद लेकर भी प्रकट हुए थे.

स्कंद पुराण के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को त्रिदोष काल में घर के दरवाजे पे दीप देने से अकाल मृत्यु का भय खत्म होता है. यह दीपक यम के नाम का होता है और उनकी पूजा और प्राथना की जाती है. माना जाता है की इस दिन त्रिदोष काल में लक्ष्मी जी की पूजा करने से वे घर पर ही ठहर जाती है. दीप दान के समय से मंत्रो का जाप करते रहना चाहिये.

धनतेरस से संबंधित पौराणिक कहानी dhanteras story in hindi

माना जाता है की एक समय भगवान विष्णु मृत्यु लोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे. लक्ष्मी जी भी उनके साथ जाना चाहती थी. भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा की वो अगर उनकी बात मानेंगी तो उनके साथ चल सकती है.लक्ष्मी जी ने यह बात मन ली और भूमण्डल पर आ गयी. कुछ देर बाद भगवन विष्णु जी ने लक्ष्मी से यह बोला की जब तक वो ना आये तुम यहाँ रुको.उन्होंने लक्ष्मी जी से कहा की वे दक्षिण दिशा की ओर जा रहे है तुम उधर ना आना. उनके जाने पर लक्ष्मी जी के मन में यह बात आई की ऐसा कौन सा रहस्य है जो मुझे मना करके भगवन खुद चल पढ़े. लक्ष्मी जी ने भगवान के चलते ही उनके पीछे पीछे चली गयी. कुछ दूर चलने पर उन्हें सबसे पहले सरसों का खेत दिखा. इसमें खूब फुल लगे थे यह देख लक्ष्मी जी मंत्रमुग्ध हो गयी और फुल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बड़ी. आगे जाकर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मी जी ने गन्ने तोड़कर चूस लिए उसी क्षण विष्णु जी वहा आये और यह देख लक्ष्मी जी से नाराज होकर उन्हें श्राप दे दिया की मैंने तुम्हे इधर आने को मना किया था पर तुम नहीं मानी और किसान की चोरी का अपराध कर बैठी अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की बारह वर्ष तक सेवा करो. ऐसा कहकर भगवन उन्हें छोड़कर क्षीर सागर चले गए.तब लक्ष्मी जी उस गरीब किसान के घर रहने लगी एक दिन लक्ष्मी जी ने उस किसान की पत्नी से कहा की तुम स्नान करके पहले मेरी बनाई गयी इस लक्ष्मी का पूजन करो फिर रसोई बनाना तब तुम जो मांगोगी मिलेगा. किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी  की किरपा से किसान का घर दुसरे ही दिन से अन्न धन रत्न स्वर्ण आदि से भर गया.लक्ष्मी ने किसान को धन धान्य से पूर्ण कर दिया. किसान के बारह वर्ष बड़े आनंद से कट गये. फिर बारह वर्ष के बाद लक्ष्मी जी जाने के लिए तैयार हुई. विष्णु जी लक्ष्मी जी को लेने आये तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया, तब भगवान ने किसान से कहा की इन्हें कौन जाने देता है ये तो चंचला है कही भी नहीं ठहरती, इनको बड़े बड़े नहीं रोक सके, इनको मेरा श्राप था इसलिए बारह वर्षो से ये आपकी सेवा कर रही थी तुम्हारी बारह वर्ष सेवा का समय पूरा हो चूका है. किसान हठपूर्वक बोला नहीं मई लक्ष्मी जी को नहीं जाने दूंगा तब लक्ष्मी जी ने कहा किसान तुम मुझे रोकना चाहते होतो जो मै कहू वैसा करो कल तेरस है त्रयोदशी है तुम घर को लीप पोतकर स्वच्छ करना, रात्रि में घी का दीपक जला कर रखना, और सांय काल मेरा पूजन करना और एक तांबे के कलश में रूपए भरकर मेरे लिए रखना. मै उस कलश में निवास करुँगी किन्तु पूजा के समय मई तुम्हे दिखाई नहीं दूंगी. इस एक दिन की पूजा से वर्ष भर मै तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी यह कहकर वह दीपक के प्रकाश के साथ दसो दिशाओ में फ़ैल गयी. अगले दिन किसान ने लक्ष्मी जी की कथा अनुसार उनका पूजन किया. उसका घर धन धान्य से पूर्ण हो गया इसी वजह से हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मी जी की पूजा होने लगी

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