जानिये जैन धर्म के इतिहास के बारे मे jain dharma history in hindi

ईसा पूर्व छठी सदी मे कई धार्मिक संप्रदायों का उदय हुआ, इन्ही में से एक था जैन धर्म, तत्कालीन सामाजिक विद्वेष के वातावरण में जैन धर्म का उदय हुआ. इस धर्म ने वैदिक धर्म की कुरीतियो की आलोचना की. जैन धर्म ने उस समय के लोगो के लिये सामाजिक समस्या के समाधान का एक नया विकल्प भी प्रस्तुत किया. हालाँकि जैन धर्म के मूल सिधांत भगवान महावीर से पहले से प्रचलित थे.

 

जानिये जैन धर्म का इतिहास (history of jain dharma)

 

जैन धर्म की स्थापना ऋषभदेव ने की, जैन धर्म के 24 तीर्थंकर थे, ऋषभदेव पहले और महावीर 24वे और आखिरी तीर्थंकर थे. जैन धर्म के शिक्षको को तीर्थंकर कहा जाता था, यानि की ऐसे महापुरुष जो पुरुषो और महिलाओ को जीवन की नदी के पार पहुचाते है. महावीर का वास्तविक नाम वर्धमान था, इनका जन्म 540 ईसा पूर्व में वैशाली के निकट कुण्डग्राम मे हुआ, इनके पिता का नाम सिद्धार्थ और माता का नाम त्रिशला था, वर्धमान का बचपन सुख समृधि मे बिता. इनका विवाह युवा होते ही यशोदा से हो गया और उन्हें एक पुत्री भी हुई. जल्द ही उनका मन सांसारिक चीजो मे नहीं लगा और 30 वर्ष की आयु में उन्होंने सन्यास ले लिया. घर छोड़ने के ग्यारह महीने बाद उन्होंने वस्त्र पहनना छोड़ दिया और मुक्ति का मार्ग खोजने के लिए 12 वर्षो तक तपस्या की. अंत में उन्हें सफलता मिली और जम्भीयग्राम के पास ऋजुपालिका नदी के तट पर एक शाल वृक्ष के नीचे उन्हे कैवल्य की प्राप्ति हुई.

 

वर्धमान का नाम भगवान महावीर कैसे पढ़ा

 

कई सालो तक तपस्या कर अद्भुत कारनामा दिखाने के कारण वे महावीर कहलाये, उन्होंने अपनी सभी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली इसलिए उन्हें जिन (विजेता) भी कहा गया. कैवल्य की प्राप्ति करने के कारण उन्हें केवलिन भी कहा गया.

 

ज्ञान प्राप्ति करने के बाद उन्होंने संसार में अपना ज्ञान फैलाया, उन्होंने अपना पहला उपदेश वितुलाचल पहाड़ी पर दिया जो की राजगृह के निकट स्थित था. उन्होंने अपने उपदेश आम बोलचाल की भाषा प्राकृत (अर्धमागधी) में दिये, उनके पहले अनुयायी उनके अपने दामाद जामिल बने. जैन धर्म की प्रमुख शिक्षा थी जीवो के प्रति अहिंसा, उनका मानना था की संपूर्ण विश्व प्राणवान है यहाँ तक की पत्थर और जल में भी जीवन होता है. इन्सान, जानवरों और कीड़े मकोड़ो, पेड़ पौधों को नहीं मारना चाहिये. उन्होंने कठोर जाती व्यवस्था की भी आलोचना की. भगवान महावीर के जीवन काल में ही यह धर्म बहुत फ़ैल गया और कई राज्यों का इसे संरक्षण भी प्राप्त हो गया. 72 वर्ष की आयु में बिहार के पावापुरी में उनकी मृत्यु हो गयी, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद भी इस धर्म का प्रसार और प्रचार होता रहा.

 

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